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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

काँप उठती हूँ मैं ये सोच के तन्हाई में
मेरे चेहरे पे तिरा नाम न पढ़ ले कोई

परवीन शाकिर




काँटों में घिरे फूल को चूम आएगी लेकिन
तितली के परों को कभी छिलते नहीं देखा

परवीन शाकिर




कभी कभार उसे देख लें कहीं मिल लें
ये कब कहा था कि वो ख़ुश-बदन हमारा हो

परवीन शाकिर




कल रात जो ईंधन के लिए कट के गिरा है
चिड़ियों को बहुत प्यार था उस बूढ़े शजर से

परवीन शाकिर




कमाल-ए-ज़ब्त को ख़ुद भी तो आज़माऊँगी
मैं अपने हाथ से उस की दुल्हन सजाऊँगी

परवीन शाकिर




कौन जाने कि नए साल में तू किस को पढ़े
तेरा मे'यार बदलता है निसाबों की तरह

परवीन शाकिर




कौन जाने कि नए साल में तू किस को पढ़े
तेरा मेयार बदलता है निसाबों की तरह

परवीन शाकिर