राय पहले से बना ली तू ने
दिल में अब हम तिरे घर क्या करते
परवीन शाकिर
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रात के शायद एक बजे हैं
सोता होगा मेरा चाँद
परवीन शाकिर
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रफ़ाक़तों का मिरी उस को ध्यान कितना था
ज़मीन ले ली मगर आसमान छोड़ गया
परवीन शाकिर
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रफ़ाक़तों के नए ख़्वाब ख़ुशनुमा हैं मगर
गुज़र चुका है तिरे ए'तिबार का मौसम
परवीन शाकिर
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रस्ते में मिल गया तो शरीक-ए-सफ़र न जान
जो छाँव मेहरबाँ हो उसे अपना घर न जान
परवीन शाकिर
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रुख़्सत करने के आदाब निभाने ही थे
बंद आँखों से उस को जाता देख लिया है
परवीन शाकिर
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शाम पड़ते ही किसी शख़्स की याद
कूचा-ए-जाँ में सदा करती है
परवीन शाकिर

