इक नाम क्या लिखा तिरा साहिल की रेत पर
फिर उम्र भर हवा से मेरी दुश्मनी रही
परवीन शाकिर
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इसी तरह से अगर चाहता रहा पैहम
सुख़न-वरी में मुझे इंतिख़ाब कर देगा
परवीन शाकिर
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इतने घने बादल के पीछे
कितना तन्हा होगा चाँद
परवीन शाकिर
जिस जा मकीन बनने के देखे थे मैं ने ख़्वाब
उस घर में एक शाम की मेहमान भी न थी
परवीन शाकिर
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जिस तरह ख़्वाब मिरे हो गए रेज़ा रेज़ा
उस तरह से न कभी टूट के बिखरे कोई
परवीन शाकिर
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जुगनू को दिन के वक़्त परखने की ज़िद करें
बच्चे हमारे अहद के चालाक हो गए
परवीन शाकिर
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जुस्तुजू खोए हुओं की उम्र भर करते रहे
चाँद के हमराह हम हर शब सफ़र करते रहे
परवीन शाकिर
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