यही काँटे तो कुछ ख़ुद्दार हैं सेहन-ए-गुलिस्ताँ में
कि शबनम के लिए दामन तो फैलाया नहीं करते
नुशूर वाहिदी
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ज़माना याद करे या सबा करे ख़ामोश
हम इक चराग़-ए-मोहब्बत जलाए जाते हैं
नुशूर वाहिदी
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ज़िंदगी परछाइयाँ अपनी लिए
आइनों के दरमियाँ से आई है
नुशूर वाहिदी
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ज़िंदगी क़रीब है किस क़दर जमाल से
जब कोई सँवर गया ज़िंदगी सँवर गई
नुशूर वाहिदी
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बच्चा मजबूरियों को क्या जाने
इक खिलौना ख़रीदना था मुझे
नुसरत ग्वालियारी
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भूल जाने का मुझे मशवरा देने वाले
याद ख़ुद को भी न मैं आऊँ कुछ ऐसा कर दे
नुसरत ग्वालियारी
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बोलते रहते हैं नुक़ूश उस के
फिर भी वो शख़्स कम-सुख़न है बहुत
नुसरत ग्वालियारी
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