कुछ एहतियात परिंदे भी रखना भूल गए
कुछ इंतिक़ाम भी आँधी ने बदतरीन लिए
नुसरत ग्वालियारी
कुछ नौ-जवान शहर से आए हैं लौट कर
अब दाव पर लगी हुई इज़्ज़त है गाँव की
नुसरत ग्वालियारी
मैं अजनबी हूँ मगर तुम कभी जो सोचोगे
कोई क़रीब का रिश्ता ज़रूर निकलेगा
नुसरत ग्वालियारी
मिलना पड़ता है हमें ख़ुद से भी ग़ैरों की तरह
उस ने माहौल ही कुछ ऐसा बना रक्खा है
नुसरत ग्वालियारी
मिरे चराग़ की नन्ही सी लौ से ख़ाइफ़ है
अजीब वक़्त पड़ा है सियाह आँधी पर
नुसरत ग्वालियारी
क़ानून जैसे खो चुका सदियों का ए'तिमाद
अब कौन देखता है ख़ता का है रुख़ किधर
नुसरत ग्वालियारी
रात के लम्हात ख़ूनी दास्ताँ लिखते रहे
सुब्ह के अख़बार में हालात बेहतर हो गए
नुसरत ग्वालियारी

