शफ़क़ सी फिर कोई उतरी है मुझ में
ये कैसी रौशनी फैली है मुझ में
नुसरत ग्वालियारी
उजाड़ तपती हुई राह में भटकने लगी
न जाने फूल ने क्या कह दिया था तितली से
नुसरत ग्वालियारी
वो अंधी राह में बीनाइयाँ बिछाता रहा
बदन पे ज़ख़्म लिए और लबों पे दीन लिए
नुसरत ग्वालियारी
वो गुलाबी बादलों में एक नीली झील सी
होश क़ाएम कैसे रहते था ही कुछ ऐसा लिबास
नुसरत ग्वालियारी
वो पता अपनी शाख़ से ज़रा जुदा हुआ ही था
न जाने फिर कहाँ कहाँ हवा उड़ा के ले गई
नुसरत ग्वालियारी
अपना सच उस को सुनाने के लिए
हम को क़िस्सों का हवाला चाहिए
उबैद हारिस
हम किताबों में जिसे पाते हैं 'हारिस'
आदमी वैसा कोई मिलता कहाँ है
उबैद हारिस

