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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

पिला साक़िया मय-ए-जाँ पिला कि मैं लाऊँ फिर ख़बर-ए-जुनूँ
ये ख़िरद की रात छटे कहीं नज़र आए फिर सहर-ए-जुनूँ

नून मीम राशिद




वही मंज़िलें वही दश्त ओ दर तिरे दिल-ज़दों के हैं राहबर
वही आरज़ू वही जुस्तुजू वही राह-ए-पुर-ख़तर-ए-जुनूँ

नून मीम राशिद




कौन तन्हाई का एहसास दिलाता है मुझे
ये भरा शहर भी तन्हा नज़र आता है मुझे

नूर जहाँ सरवत




परिंदों में तो ये फ़िरक़ा-परस्ती भी नहीं देखी
कभी मंदिर पे जा बैठे कभी मस्जिद पे जा बैठे

नूर तक़ी नूर




दिल का क्या है दिल ने कितने मंज़र देखे लेकिन
आँखें पागल हो जाती हैं एक ख़याल से पहले

नोशी गिलानी




जलाए रक्खूँ-गी सुब्ह तक मैं तुम्हारे रस्तों में अपनी आँखें
मगर कहीं ज़ब्त टूट जाए तो बारिशें भी शुमार करना

नोशी गिलानी




किसी हर्फ़ में किसी बाब में नहीं आएगा
तिरा ज़िक्र मेरी किताब में नहीं आएगा

नोशी गिलानी