वो ख़ुदा जाने घर में हैं कि नहीं
कुछ खुला और कुछ है बंद किवाड़
नूह नारवी
वो ख़ुदाई कर रहे थे जब ख़ुदा होने से क़ब्ल
तो ख़ुदा जाने करेंगे क्या ख़ुदा होने के बा'द
नूह नारवी
ये मेरे पास जो चुप-चाप आए बैठे हैं
हज़ार फ़ित्ना-ए-महशर उठाए बैठे हैं
नूह नारवी
दिन तो ख़ैर गुज़र जाता है
रातें पागल कर देती हैं
नून मीम दनिश
गर्दिश-ए-माह-ओ-साल से आगे निकल गया हूँ मैं
जैसे बदल गए हो तुम जैसे बदल गया हूँ मैं
नून मीम दनिश
ये भी तो जब्र-ए-वक़्त है तू मुझे याद भी नहीं
जैसे सँभल गए हो तुम वैसे सँभल गया हूँ मैं
नून मीम दनिश
ग़म-ए-आशिक़ी में गिरह-कुशा न ख़िरद हुई न जुनूँ हुआ
वो सितम सहे कि हमें रहा न पए-ख़िरद न सर-ए-जुनूँ
नून मीम राशिद

