तासीर के दो हिस्से अगर हों तो मज़ा है
इक मेरी फ़ुग़ाँ को मिले इक तेरी अदा को
नूह नारवी
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तुम्हारी शोख़-नज़र इक जगह कभी न रही
न ये थमी न ये ठहरी न ये रुकी न रही
नूह नारवी
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उन का वा'दा उन का पैमाँ उन का इक़रार उन का क़ौल
जितनी बातें हैं हसीनों की वो बे-बुनियाद हैं
नूह नारवी
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उन से सब हाल दग़ाबाज़ कहे देते हैं
मेरे हमराज़ मिरा राज़ कहे देते हैं
नूह नारवी
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वो बात क्या जो और की तहरीक से हुई
वो काम क्या जो ग़ैर की इमदाद से हुआ
नूह नारवी
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वो घर से चले राह में रुक गए
इधर आते आते किधर झुक गए
नूह नारवी
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वो हाथ में तलवार लिए सर पे खड़े हैं
मरने नहीं देती मुझे मरने की ख़ुशी आज
नूह नारवी
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