मौसम-ए-गुल अभी नहीं आया
चल दिए घर में हम लगा कर आग
नूह नारवी
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मज़हब-इश्क़-ओ-वफ़ा मुझ को ये देता है सलाह
तू जो काफ़िर नहीं होता तो मुसलमाँ भी न हो
नूह नारवी
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मिलना जो न हो तुम को तो कह दो न मिलेंगे
ये क्या कभी परसों है कभी कल है कभी आज
नूह नारवी
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मुझ को ख़याल-ए-अबरू-ए-ख़मदार हो गया
ख़ंजर तिरा गले का मिरे हार हो गया
नूह नारवी
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मुझ को नज़रों के लड़ाने से है काम
आप को आँखें दिखाने से ग़रज़
नूह नारवी
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मुझ को ये फ़िक्र कि दिल मुफ़्त गया हाथों से
उन को ये नाज़ कि हम ने उसे छीना कैसा
नूह नारवी
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न मिलो खुल के तो चोरी की मुलाक़ात रहे
हम बुलाएँगे तुम्हें रात गए रात रहे
नूह नारवी
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