जो वक़्त जाएगा वो पलट कर न आएगा
दिन रात चाहिए सहर-ओ-शाम का लिहाज़
नूह नारवी
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का'बा हो दैर हो दोनों में है जल्वा उस का
ग़ौर से देखे अगर देखने वाला उस का
नूह नारवी
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काबा हो कि बुत-ख़ाना हो ऐ हज़रत-ए-वाइज़
जाएँगे जिधर आप न जाएँगे उधर हम
नूह नारवी
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कह रही है ये तिरी तस्वीर भी
मैं किसी से बोलने वाली नहीं
नूह नारवी
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कहीं न उन की नज़र से नज़र किसी की लड़े
वो इस लिहाज़ से आँखें झुकाए बैठे हैं
नूह नारवी
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कम्बख़्त कभी जी से गुज़रने नहीं देती
जीने की तमन्ना मुझे मरने नहीं देती
नूह नारवी
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ख़ाक हो कर ही हम पहुँच जाते
उस तरफ़ की मगर हवा भी नहीं
नूह नारवी
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