जिया हूँ उम्र भर मैं भी अकेला
उसे भी क्या मिला नाराज़गी से
नवनीत शर्मा
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किस ने सोचा था कि ख़ुद से मिल कर
अपनी आवाज़ से डर जाना है
नवनीत शर्मा
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मिरे अंदर मिरा कुछ भी नहीं बस तू है बाक़ी
तिरे अंदर बता प्यारे मैं अब कितना बचा हूँ
नवनीत शर्मा
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मिरे क़रीब कोई ख़्वाब कैसे आ पाता
कि मुझ में रहते हैं बरसों से रतजगे रौशन
नवनीत शर्मा
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फ़ोन पर बात हुई उस से तो अंदाज़ा हुआ
अपनी आवाज़ में बस आज ही शामिल हुआ मैं
नवनीत शर्मा
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बिखरे हुए ख़्वाबों की वो तस्वीर है शायद
अब ये भी नहीं याद कहाँ उस से मिला था
नवाब अहसन
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एहसास-ए-तीरगी था उसे रौशनी के बा'द
इस ख़ौफ़ से चराग़ की लौ काँपती रही
नवाब अहसन
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