जब भी लौटा गाँव के बाज़ार से
मुझ को सब बच्चों ने देखा प्यार से
नवाब अहसन
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ख़ौफ़-ओ-दहशत से लब नहीं खुलते
वर्ना क़ातिल मिरी निगाह में है
नवाब अहसन
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शब-ए-फ़िराक़ की तन्हाइयों में तेरा ख़याल
मिरे वजूद से करता रहा जुदा मुझ को
नवाब अहसन
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उस ने तो छीना था मेरे जिस्म से मेरा लिबास
जब पहन कर उस ने देखा तो क़बा ढीली मिली
नवाब अहसन
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एहसास मुझ को इतना भी अब तो नहीं 'नवाब'
मैं जी रहा हूँ आज भी कि मर गया हूँ मैं
नवाब शाहाबादी
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जाने क्यूँ दोज़ख़ से बद-तर हो गए हालात आज
रश्क-ए-जन्नत कल तलक हिन्दोस्ताँ मेरा भी था
नवाब शाहाबादी
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भूके बच्चों की तसल्ली के लिए
माँ ने फिर पानी पकाया देर तक
नवाज़ देवबंदी

