आई होगी तो मौत आएगी
तुम तो जाओ मिरा ख़ुदा हाफ़िज़
नातिक़ गुलावठी
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आख़िर को राहबर ने ठिकाने लगा दिया
ख़ुद अपनी राह ली मुझे रस्ता बता दिया
नातिक़ गुलावठी
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आलम-ए-कौन-ओ-मकाँ नाम है वीराने का
पास वहशत नहीं घर दूर है दीवाने का
नातिक़ गुलावठी
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आती है याद सुब्ह-ए-मसर्रत की बार बार
ख़ुर्शीद आते आते उसे कल उठा तो ला
नातिक़ गुलावठी
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अब गर्दिश-ए-दौराँ को ले आते हैं क़ाबू में
हम दौर चलाते हैं साक़ी से कहो मय ला
नातिक़ गुलावठी
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अब जहाँ में बाक़ी है आह से निशाँ अपना
उड़ गए धुएँ अपने रह गया धुआँ अपना
नातिक़ गुलावठी
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अब कहाँ गुफ़्तुगू मोहब्बत की
ऐसी बातें हुए ज़माना हुआ
नातिक़ गुलावठी
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