ऐ ज़िंदगी जुनूँ न सही बे-ख़ुदी सही
तू कुछ भी अपनी अक़्ल से पागल उठा तो ला
नातिक़ गुलावठी
ऐसे बोहतान लगाए कि ख़ुदा याद आया
बुत ने घबरा के कहा मुझ से कि क़ुरआन उठा
नातिक़ गुलावठी
अव्वल अव्वल ख़ूब दौड़ी कश्ती-ए-अहल-ए-हवस
आख़िर आख़िर डूब मरने का मक़ाम आ ही गया
नातिक़ गुलावठी
बंदगी कीजिए मगर किस की
है भी दुनिया में कोई बंदा-नवाज़
नातिक़ गुलावठी
बे-ख़ुद-ए-शौक़ हूँ आता है ख़ुदा याद मुझे
रास्ता भूल के बैठा हूँ सनम-ख़ाने का
नातिक़ गुलावठी
बुतों के साथ ली दी सी जो याद-अल्लाह बाक़ी है
तो क्या शैख़-ए-हरम तेरे लिए मैं छोड़ दूँ वो भी
नातिक़ गुलावठी
चाल और है दुनिया की हमारा है चलन और
वो साख़्त है कुछ और ये बे-साख़्ता-पन और
नातिक़ गुलावठी

