हाँ ये ख़ता हुई थी कि हम उठ के चल दिए
तुम ने भी तो पलट के पुकारा नहीं हमें
नासिर ज़ैदी
कोई सन्नाटा सा सन्नाटा है
काश तूफ़ान उठा दे कोई
नासिर ज़ैदी
मैं बे-हुनर था मगर सोहबत-ए-हुनर में रहा
शुऊ'र बख़्शा हमा-रंग महफ़िलों ने मुझे
नासिर ज़ैदी
वो भी क्या दिन थे कि जब इश्क़ किया करते थे
हम जिसे चाहते थे चूम लिया करते थे
नासिर ज़ैदी
वो यूँ मिला है कि जैसे कभी मिला ही न था
हमारी ज़ात पे जिस की इनायतें थीं बहुत
नासिर ज़ैदी
आ के बज़्म-ए-हस्ती में क्या बताएँ क्या पाया
हम को था ही क्या लेना बुत मिले ख़ुदा पाया
नातिक़ गुलावठी
आ उम्र-ए-रफ़्ता हश्र के दम-ख़म भी देख लें
तूफ़ान-ए-ज़िंदगी की वो हलचल उठा तो ला
नातिक़ गुलावठी

