अब कहें किस से कि उन से बात करना है गुनाह
जब कलाम आया ज़बाँ पर ला-कलाम आ ही गया
नातिक़ गुलावठी
अहल-ए-जुनूँ पे ज़ुल्म है पाबंदी-ए-रुसूम
जादा हमारे वास्ते काँटा है राह का
नातिक़ गुलावठी
ऐ बादा-कश गई है मय-ए-ऐश किस के साथ
हर इक ने ले के जाम को आगे बढ़ा दिया
नातिक़ गुलावठी
ऐ दिल-ए-शिकवा-संज क्या गुज़री
किस लिए होंट रह गए सिल के
नातिक़ गुलावठी
ऐ जुनूँ बाइस-ए-बद-हाली-ए-सहरा क्या है
ये मिरा घर तो नहीं था कि जो वीराँ होता
नातिक़ गुलावठी
ऐ निगाह-ए-मस्त उस का नाम है कैफ़-ए-सुरूर
आज तू ने देख कर मेरी तरफ़ देखा मुझे
नातिक़ गुलावठी
ऐ शब-ए-हिज्राँ ज़ियादा पाँव फैलाती है क्यूँ
भर गया जितना हमारी उम्र का पैमाना था
नातिक़ गुलावठी

