अक़्ल से सिर्फ़ ज़ेहन रौशन था
इश्क़ ने दिल में रौशनी की है
नरेश कुमार शाद
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ख़ुदा से क्या मोहब्बत कर सकेगा
जिसे नफ़रत है उस के आदमी से
नरेश कुमार शाद
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ख़ुदा से लोग भी ख़ाइफ़ कभी थे
मगर लोगों से अब ख़ाइफ़ ख़ुदा है
नरेश कुमार शाद
किसी के जौर-ओ-सितम का तो इक बहाना था
हमारे दिल को बहर-हाल टूट जाना था
नरेश कुमार शाद
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महफ़िल उन की साक़ी उन का
आँखें अपनी बाक़ी उन का
नरेश कुमार शाद
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महसूस भी हो जाए तो होता नहीं बयाँ
नाज़ुक सा है जो फ़र्क़ गुनाह ओ सवाब में
नरेश कुमार शाद
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तूफ़ान-ए-ग़म की तुंद हवाओं के बावजूद
इक शम-ए-आरज़ू है जो अब तक बुझी नहीं
नरेश कुमार शाद
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