कोई किस तरह राज़-ए-उल्फ़त छुपाए
निगाहें मिलीं और क़दम डगमगाए
नख़्शब जार्चवि
वा'दे का ए'तिबार तो है वाक़ई मुझे
ये और बात है कि हँसी आ गई मुझे
नख़्शब जार्चवि
अपनी पर्वाज़ को मैं सम्त भी ख़ुद ही दूँगा
तो मुझे अपनी रिवायात का पाबंद न कर
नामी अंसारी
अपनी पर्वाज़ को मैं सम्त भी ख़ुद ही दूँगा
तू मुझे अपनी रिवायात का पाबंद न कर
नामी अंसारी
हम ने क्या पा लिया हिन्दू या मुसलमाँ हो कर
क्यूँ न इंसाँ से मोहब्बत करें इंसाँ हो कर
नक़्श लायलपुरी
नाम होंटों पे तिरा आए तो राहत सी मिले
तू तसल्ली है दिलासा है दुआ है क्या है
नक़्श लायलपुरी
ये अंजुमन ये क़हक़हे ये महवशों की भीड़
फिर भी उदास फिर भी अकेली है ज़िंदगी
नक़्श लायलपुरी

