दर्द की लहर में ज़िंदगी बह गई
उम्र यूँ कट गई हिज्र की शाम में
नजमा शाहीन खोसा
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ज़मीन पाँव तले है न आसमाँ सर पर
पड़े हैं घर में कई लोग बे-घरों की तरह
नजमी सिद्दीक़ी
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बदन को जाँ से जुदा हो के ज़िंदा रहना है
ये फ़ैसला है फ़ना हो के ज़िंदा रहना है
नज्मुस्साक़िब
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दिल को आज तसल्ली मैं ने दे डाली
वो सच्चा था उस के वादे झूटे थे
नज्मुस्साक़िब
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दुख-भरा शहर का मंज़र कभी तब्दील भी हो
दर्द को हद से गुज़रते कोई कब तक देखे
नज्मुस्साक़िब
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हुनूज़ रात है जलना पड़ेगा उस को भी
कि मेरे साथ पिघलना पड़ेगा उस को भी
नज्मुस्साक़िब
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कभी न टूटने वाला हिसार बन जाऊँ
वो मेरी ज़ात में रहने का फ़ैसला तो करे
नज्मुस्साक़िब
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