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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

'नजीब' इक वहम था दो चार दिन का साथ है लेकिन
तिरे ग़म से तो सारी उम्र का रिश्ता निकल आया

नजीब अहमद




फिर यूँ हुआ कि मुझ पे ही दीवार गिर पड़ी
लेकिन न खुल सका पस-ए-दीवार कौन है

नजीब अहमद




रुकूँ तो हुजला-ए-मंज़िल पुकारता है मुझे
क़दम उठाऊँ तो रस्ता नज़र नहीं आता

नजीब अहमद




वही रिश्ते वही नाते वही ग़म
बदन से रूह तक उकता गई थी

नजीब अहमद




ज़मीं पे पाँव ज़रा एहतियात से धरना
उखड़ गए तो क़दम फिर कहाँ सँभलते हैं

नजीब अहमद




ज़िंदगी भर की कमाई ये तअल्लुक़ ही तो है
कुछ बचे या न बचे इस को बचा रखते हैं

नजीब अहमद




ख़याल अपना कमाल अपना उरूज अपना ज़वाल अपना
ये किन भुलैयों में डाल रखा है कैसी लीला रची हुई है

नजीबा आरिफ़