ज़मीं के गिर्द भी पानी ज़मीं की तह में भी
ये शहर जम के खड़ा है जो तैरता ही न हो
मुनीर नियाज़ी
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ज़वाल-ए-अस्र है कूफ़े में और गदागर हैं
खुला नहीं कोई दर बाब-ए-इल्तिजा के सिवा
मुनीर नियाज़ी
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ज़िंदा लोगों की बूद-ओ-बाश में हैं
मुर्दा लोगों की आदतें बाक़ी
मुनीर नियाज़ी
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ज़िंदा रहें तो क्या है जो मर जाएँ हम तो क्या
दुनिया से ख़ामुशी से गुज़र जाएँ हम तो क्या
मुनीर नियाज़ी
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ख़ौफ़ हर घर से झाँकता होगा
शहर इक दश्त-ए-बे-सदा होगा
मुनीर सैफ़ी
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कोई दो मिनट हिल गई थी ज़मीं
झुका ख़ाक पर सर मिनारों का था
मुनीर सैफ़ी
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'सैफ़ी' मेरे उजले उजले कोट पर
मल गया कालक दिसम्बर देख ले
मुनीर सैफ़ी
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