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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

ऐ बुत ये है नमाज़ कि है घात क़त्ल की
निय्यत अदा की है कि इशारे क़ज़ा के हैं

मुनीर शिकोहाबादी




ऐ रश्क-ए-माह रात को मुट्ठी न खोलना
मेहदी का चोर हाथ से जाए न छूट के

मुनीर शिकोहाबादी




अशआ'र मेरे सुन के वो ख़ामोश हो गया
ग़ुंचे ब-रंग-ए-गुल हमा-तन गोश हो गया

मुनीर शिकोहाबादी




बरहमन का'बे में आया शैख़ पहूँचा दैर में
लोग बे-वहदत हुए हैं तेरी कसरत देख कर

मुनीर शिकोहाबादी




बस कि है पेश-ए-नज़र पस्त-ओ-बुलंद-ए-आलम
ठोकरें खा के मिरी आँखों में ख़्वाब आता है

मुनीर शिकोहाबादी




बे-इल्म शाइरों का गिला क्या है ऐ 'मुनीर'
है अहल-ए-इल्म को तिरा तर्ज़-ए-बयाँ पसंद

मुनीर शिकोहाबादी




बे-तकल्लुफ़ आ गया वो मह दम-ए-फ़िक्र-ए-सुख़न
रह गया पास-ए-अदब से क़ाफ़िया आदाब का

मुनीर शिकोहाबादी