भटके फिरे दो अमला-ए-दैर-ओ-हरम में हम
इस सम्त कुफ़्र उस तरफ़ इस्लाम ले गया
मुनीर शिकोहाबादी
बिगड़ी हुई है सारी हसीनों की बनावट
अल्लाह-रे आलम तिरे बे-साख़्ता-पन का
मुनीर शिकोहाबादी
बिस्मिलों से बोसा-ए-लब का जो वा'दा हो गया
ख़ुद-ब-ख़ुद हर ज़ख़्म का अंगूर मीठा हो गया
मुनीर शिकोहाबादी
बोसा होंटों का मिल गया किस को
दिल में कुछ आज दर्द मीठा है
मुनीर शिकोहाबादी
बोसा-ए-लब ग़ैर को देते हो तुम
मुँह मिरा मीठा किया जाता नहीं
मुनीर शिकोहाबादी
बोसे हैं बे-हिसाब हर दिन के
वा'दे क्यूँ टालते हो गिन गिन के
मुनीर शिकोहाबादी
चेहरा तमाम सुर्ख़ है महरम के रंग से
अंगिया का पान देख के मुँह लाल हो गया
मुनीर शिकोहाबादी

