कब उन आँखों का सामना न हुआ
तीर जिन का कभी ख़ता न हुआ
मुबारक अज़ीमाबादी
कब वो आएँगे इलाही मिरे मेहमाँ हो कर
कौन दिन कौन बरस कौन महीना होगा
मुबारक अज़ीमाबादी
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कभी दिल की कली खिली ही नहीं
ए'तिबार-ए-बहार कौन करे
मुबारक अज़ीमाबादी
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कहाँ क़िस्मत में इस की फूल होना
वही दिल की कली है और हम हैं
मुबारक अज़ीमाबादी
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कहीं ऐसा न हो कम-बख़्त में जान आ जाए
इस लिए हाथ में लेते मिरी तस्वीर नहीं
मुबारक अज़ीमाबादी
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कल तो देखा था 'मुबारक' बुत-कदे में आप को
आज हज़रत जा के मस्जिद में मुसलमाँ हो गए
मुबारक अज़ीमाबादी
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कली रह गई ना-शगुफ़्ता हमारी
गिला रह गया ये नसीम-ए-चमन से
मुबारक अज़ीमाबादी
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