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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

कब उन आँखों का सामना न हुआ
तीर जिन का कभी ख़ता न हुआ

मुबारक अज़ीमाबादी




कब वो आएँगे इलाही मिरे मेहमाँ हो कर
कौन दिन कौन बरस कौन महीना होगा

मुबारक अज़ीमाबादी




कभी दिल की कली खिली ही नहीं
ए'तिबार-ए-बहार कौन करे

मुबारक अज़ीमाबादी




कहाँ क़िस्मत में इस की फूल होना
वही दिल की कली है और हम हैं

मुबारक अज़ीमाबादी




कहीं ऐसा न हो कम-बख़्त में जान आ जाए
इस लिए हाथ में लेते मिरी तस्वीर नहीं

मुबारक अज़ीमाबादी




कल तो देखा था 'मुबारक' बुत-कदे में आप को
आज हज़रत जा के मस्जिद में मुसलमाँ हो गए

मुबारक अज़ीमाबादी




कली रह गई ना-शगुफ़्ता हमारी
गिला रह गया ये नसीम-ए-चमन से

मुबारक अज़ीमाबादी