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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

जबीं पर ख़ाक है ये किस के दर की
बलाएँ ले रहा हूँ अपने सर की

मुबारक अज़ीमाबादी




जिनाँ की कहते हैं यूँ मुझ से हज़रत-ए-वाइज़
कि जैसे देखी न हो यार की गली मैं ने

मुबारक अज़ीमाबादी




जो दिल-नशीं हो किसी के तो इस का क्या कहना
जगह नसीब से मिलती है दिल के गोशों में

मुबारक अज़ीमाबादी




जो लड़खड़ाए क़दम मय-कदे में मस्तों के
बग़ल में हज़रत-ए-नासेह थे बढ़ के थाम लिया

मुबारक अज़ीमाबादी




जो निगाह-ए-नाज़ का बिस्मिल नहीं
दिल नहीं वो दिल नहीं वो दिल नहीं

मुबारक अज़ीमाबादी




जो क़यामत का नहीं दिन वो मिरा दिन कैसा
जो तड़प कर न कटी हो वो मिरी रात नहीं

मुबारक अज़ीमाबादी




जो उन को चाहिए वो किए जा रहे हैं वो
जो मुझ को चाहिए वो किए जा रहा हूँ मैं

मुबारक अज़ीमाबादी