जबीं पर ख़ाक है ये किस के दर की
बलाएँ ले रहा हूँ अपने सर की
मुबारक अज़ीमाबादी
जिनाँ की कहते हैं यूँ मुझ से हज़रत-ए-वाइज़
कि जैसे देखी न हो यार की गली मैं ने
मुबारक अज़ीमाबादी
जो दिल-नशीं हो किसी के तो इस का क्या कहना
जगह नसीब से मिलती है दिल के गोशों में
मुबारक अज़ीमाबादी
जो लड़खड़ाए क़दम मय-कदे में मस्तों के
बग़ल में हज़रत-ए-नासेह थे बढ़ के थाम लिया
मुबारक अज़ीमाबादी
जो निगाह-ए-नाज़ का बिस्मिल नहीं
दिल नहीं वो दिल नहीं वो दिल नहीं
मुबारक अज़ीमाबादी
जो क़यामत का नहीं दिन वो मिरा दिन कैसा
जो तड़प कर न कटी हो वो मिरी रात नहीं
मुबारक अज़ीमाबादी
जो उन को चाहिए वो किए जा रहे हैं वो
जो मुझ को चाहिए वो किए जा रहा हूँ मैं
मुबारक अज़ीमाबादी

