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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

हवा बाँधते हैं जो हज़रत जिनाँ की
गली में हसीनों की आए गए हैं

मुबारक अज़ीमाबादी




हज़ारों मय-कदे सर पर लिए हैं
ये बादल हैं बड़े सामान वाले

मुबारक अज़ीमाबादी




ईमान की तो ये है कि ईमान अब कहाँ
काफ़िर बना गई तिरी काफ़िर-नज़र मुझे

मुबारक अज़ीमाबादी




इक मिरा सर कि क़दम-बोसी की हसरत इस को
इक तिरी ज़ुल्फ़ कि क़दमों से लगी रहती है

मुबारक अज़ीमाबादी




इक तिरी बात कि जिस बात की तरदीद मुहाल
इक मिरा ख़्वाब कि जिस ख़्वाब की ताबीर नहीं

मुबारक अज़ीमाबादी




इस भरी महफ़िल में हम से दावर-ए-महशर न पूछ
हम कहेंगे तुझ से अपनी दास्ताँ सब से अलग

मुबारक अज़ीमाबादी




जाँ-निसारान-ए-मोहब्बत में न हो अपना शुमार
इम्तिहाँ इस लिए ज़ालिम ने हमारा न किया

मुबारक अज़ीमाबादी