हवा चराग़ बुझाने लगी तो हम ने भी
दिए की लौ की जगह तेरा इंतिज़ार रखा
मोहसिन असरार
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जगह बदलने से हैअत कहाँ बदलती है
जो आइना है सदा आइना रहेगा वो
मोहसिन असरार
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जैसे सज्दे में क़त्ल हो कोई
ऐसा होता है चाहतों का मज़ा
मोहसिन असरार
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जवाब देता है मेरे हर इक सवाल का वो
मगर सवाल भी उस की तरफ़ से होता है
मोहसिन असरार
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जिस दिन के गुज़रते ही यहाँ रात हुई है
ऐ काश वो दिन मैं ने गुज़ारा नहीं होता
मोहसिन असरार
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जिस लफ़्ज़ को मैं तोड़ के ख़ुद टूट गया हूँ
कहता भी तो वो उस को गवारा नहीं होता
मोहसिन असरार
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ख़ुद को मैं भला ज़ेर-ए-ज़मीं कैसे दबाता
जितने भी खंडर निकले वो आबाद से निकले
मोहसिन असरार
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