इस लिए सुनता हूँ 'मोहसिन' हर फ़साना ग़ौर से
इक हक़ीक़त के भी बन जाते हैं अफ़्साने बहुत
मोहसिन भोपाली
जाने वाले सब आ चुके 'मोहसिन'
आने वाला अभी नहीं आया
मोहसिन भोपाली
जो मिले थे हमें किताबों में
जाने वो किस नगर में रहते हैं
मोहसिन भोपाली
ख़ंदा-ए-लब में निहाँ ज़ख़्म-ए-हुनर देखेगा कौन
बज़्म में हैं सब के सब अहल-ए-नज़र देखेगा कौन
मोहसिन भोपाली
किस क़दर नादिम हुआ हूँ मैं बुरा कह कर उसे
क्या ख़बर थी जाते जाते वो दुआ दे जाएगा
मोहसिन भोपाली
कोई सूरत नहीं ख़राबी की
किस ख़राबे में बस रहा है जिस्म
मोहसिन भोपाली
क्या ख़बर थी हमें ये ज़ख़्म भी खाना होगा
तू नहीं होगा तिरी बज़्म में आना होगा
मोहसिन भोपाली

