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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

अजीब शख़्स था लौटा गया मिरा सब कुछ
मुआवज़ा न लिया देख-भाल करने का

मोहसिन असरार




बहुत अच्छा तिरी क़ुर्बत में गुज़रा आज का दिन
बस अब घर जाएँगे और कल की तय्यारी करेंगे

मोहसिन असरार




बहुत कुछ तुम से कहना था मगर मैं कह न पाया
लो मेरी डाइरी रख लो मुझे नींद आ रही है

मोहसिन असरार




डर है कहीं मैं दश्त की जानिब निकल न जाऊँ
बैठा हूँ अपने पाँव में ज़ंजीर डाल कर

मोहसिन असरार




घर में रहना मिरा गोया उसे मंज़ूर नहीं
जब भी आता है नया काम बता जाता है

मोहसिन असरार




हम अपने ज़ाहिर ओ बातिन का अंदाज़ा लगा लें
फिर उस के सामने जाने की तय्यारी करेंगे

मोहसिन असरार




हम-साए का सुख तो उस के ख़्वाब का पूरा होना है
तुम पर रिक़्क़त तारी हो तो रो लो लेकिन शोर न हो

मोहसिन असरार