दुश्मनों की दुश्मनी मेरे लिए आसान थी
ख़र्च आया दोस्तों की मेज़बानी में बहुत
मोहम्मद यूसुफ़ पापा
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दूसरी ने जो सँभाली चप्पल
पहली बीवी की वफ़ा याद आई
मोहम्मद यूसुफ़ पापा
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इश्क़ औलाद कर रही है मगर
मेरा जीना हराम होता है
मोहम्मद यूसुफ़ पापा
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जब भी वालिद की जफ़ा याद आई
अपने दादा की ख़ता याद आई
मोहम्मद यूसुफ़ पापा
जब हुआ काले का गोरे से मिलाप
मिल गईं तारीकियाँ तनवीर से
मोहम्मद यूसुफ़ पापा
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जल गया कौन मेरे हँसने पर
''ये धुआँ सा कहाँ से उठता है''
मोहम्मद यूसुफ़ पापा
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झूट है दिल न जाँ से उठता है
ये धुआँ दरमियाँ से उठता है
मोहम्मद यूसुफ़ पापा
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