जहाँ वो है नहीं वाँ कुफ़्र ओ इस्लाम
अबस झगड़ा है शैख़ ओ बरहमन में
मीर मोहम्मदी बेदार
जुनूँ ने दस्त-कारी ऐसी भी की
न था गोया गरेबाँ पैरहन में
मीर मोहम्मदी बेदार
ख़ुशी है सब को रोज़-ए-ईद की याँ
हुए हैं मिल के बाहम आश्ना ख़ुश
मीर मोहम्मदी बेदार
किस तरह हाल-ए-दिल कहूँ उस गुल से बाग़ में
फिरती है उस के साथ तो हर-दम सबा लगी
मीर मोहम्मदी बेदार
किया हंगामा-ए-गुल ने मिरा जोश-ए-जुनूँ ताज़ा
उधर आई बहार ईधर गरेबाँ का रफ़ू टूटा
मीर मोहम्मदी बेदार
क्या हो गर कोई घड़ी याँ भी करम फ़रमाओ
आप इस राह से आख़िर तो गुज़र करते हैं
मीर मोहम्मदी बेदार
मय-कदे में जो तिरे हुस्न का मज़कूर हुआ
संग-ए-ग़ैरत से मिरा शीशा-ए-दिल चूर हुआ
मीर मोहम्मदी बेदार

