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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

मश्शाता देख शाने से तेरा कटेगा हाथ
टूटा गर एक बाल कभू ज़ुल्फ़-ए-यार का

मीर मोहम्मदी बेदार




मेहराब-ए-अबरू-ए-बुत-ए-काफ़िर-अदा को देख
काबा का शैख़ बाँध के एहराम रह गया

मीर मोहम्मदी बेदार




मिन्नत-ओ-आजिज़ी ओ ज़ारी-ओ-आह
तेरे आगे हज़ार कर देखा

मीर मोहम्मदी बेदार




मोहब्बत ऐसे की 'बेदार' सख़्त मुश्किल है
जो अपनी जान से गुज़रे वो उस की चाह करे

मीर मोहम्मदी बेदार




नहीं कुछ अब्र ही शागिर्द मेरी अश्क-बारी का
सबक़ लेती है मुझ से बर्क़ भी आबे करारी का

मीर मोहम्मदी बेदार




नश्शा-ए-हुस्न में सरशार चला जाता है
शब-ए-तारीक है दिलदार ख़ुदा को सौंपा

मीर मोहम्मदी बेदार




नश्शे में जी चाहता है बोसा-बाज़ी कीजिए
इतनी रुख़्सत दीजिए बंदा-नवाज़ी कीजिए

मीर मोहम्मदी बेदार