एक दर्द-ए-जुदाई का ग़म क्या करें
किस मरज़ की दवा है तिरे शहर में
मज़हर इमाम
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एक मैं ने ही उगाए नहीं ख़्वाबों के गुलाब
तू भी इस जुर्म में शामिल है मिरा साथ न छोड़
मज़हर इमाम
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हैं चनारों के चेहरे भी झुलसे हुए
ज़ख़्म सब का हरा है तिरे शहर में
मज़हर इमाम
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हम ने तो दरीचों पे सजा रक्खे हैं पर्दे
बाहर है क़यामत का जो मंज़र तो हमें क्या
मज़हर इमाम
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हमें वो हमीं से जुदा कर गया
बड़ा ज़ुल्म इस मेहरबानी में था
मज़हर इमाम
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जब हम तेरा नाम न लेंगे
वो भी एक ज़माना होगा
मज़हर इमाम
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कहा ये सब ने कि जो वार थे उसी पर थे
मगर ये क्या कि बदन चूर चूर मेरा था
मज़हर इमाम
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