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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

रुमूज़-ए-इश्क़-ओ-मोहब्बत से आश्ना हूँ मैं
किसी को ग़म-ज़दा देखा तो रो दिया हूँ मैं

मतीन नियाज़ी




तिरी समझ में न आ सकेगी किसी के अश्कों की क़द्र-ओ-क़ीमत
अभी है ना-आश्ना-ए-ग़म तू अभी तिरा दिल दुखा नहीं है

मतीन नियाज़ी




तूफ़ाँ से बच के डूबी है कश्ती कहाँ न पूछ
साहिल भी ए'तिबार के क़ाबिल नहीं रहा

मतीन नियाज़ी




यही आइना है वो आईना जो लिए है जल्वा-ए-आगही
ये जो शाएरी का शुऊर है ये पयम्बरी की तलाश है

मतीन नियाज़ी




ये ज़िंदगी जिसे अपना समझ रहे हैं सब
है मुस्तआर फ़क़त रौनक-ए-जहाँ के लिए

मतीन नियाज़ी




ज़िंदगी की भी यक़ीनन कोई मंज़िल होगी
ये सफ़र ही की तरह एक सफ़र है कि नहीं

मतीन नियाज़ी




कलियों को खुल के हँसने का अंदाज़ आ गया
गुलशन में आ के तुम जो ज़रा मुस्कुरा गए

मायल ख़ैराबादी