किस सम्त जा रहा है ज़माना कहा न जाए
उकता गए हैं लोग फ़साना कहा न जाए
मज़हर इमाम
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न इतनी दूर जाइए कि लोग पूछने लगें
किसी को दिल की क्या ख़बर ये हाथ तो मिला रहे
मज़हर इमाम
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निगाह ओ दिल के पास हो वो मेरा आश्ना रहे
हवस है या कि इश्क़ है ये कौन सोचता रहे
मज़हर इमाम
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सफ़र में अचानक सभी रुक गए
अजब मोड़ अपनी कहानी में था
मज़हर इमाम
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समेट लें मह ओ ख़ुर्शीद रौशनी अपनी
सलाहियत है ज़मीं में भी जगमगाने की
मज़हर इमाम
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तू न होगा तो कहाँ जा के जलूँगा शब भर
तुझ से ही गर्मी-ए-महफ़िल है मिरा साथ न छोड़
मज़हर इमाम
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उस घर की बदौलत मिरे शेरों को है शोहरत
वो घर कि जो इस शहर में बदनाम बहुत है
मज़हर इमाम

