वतन को फूँक रहे हैं बहुत से अहल-ए-वतन
चराग़ घर के हैं सरगर्म घर जलाने में
महताब अालम
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ये सन कर मेरी नींदें उड़ गई हैं
कोई मेरा भी सपना देखता है
महताब अालम
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ज़मीं क्यूँ मुझ से टकराती उफ़ुक़ पर
मिरा घर था मिरे ज़ाती उफ़ुक़ पर
महताब अालम
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ज़ेहन ऐसे भी न बन जाएँ निसाबों वाले
गुफ़्तुगू में भी हूँ अल्फ़ाज़ किताबों वाले
महताब अालम
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एक मैं हूँ और दस्तक कितने दरवाज़ों पे दूँ
कितनी दहलीज़ों पे सज्दा एक पेशानी करे
महताब हैदर नक़वी
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मतलब के लिए हैं न मआनी के लिए हैं
ये शेर तबीअत की रवानी के लिए हैं
महताब हैदर नक़वी
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एक रस्म-ए-सरफ़रोशी थी सो रुख़्सत हो गई
यूँ तो दीवाने हमारे ब'अद भी आए बहुत
महताब ज़फ़र
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