बलाएँ ले रहा हूँ इस ज़मीं के ज़र्रे ज़र्रे की
लुटा था जिस जगह राह-ए-वफ़ा में कारवाँ मेरा
महशर लखनवी
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दे के साग़र मुझे किस लुत्फ़ से साक़ी ने कहा
देखते जाओ अभी हम तुम्हें क्या देते हैं
महशर लखनवी
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शिकवा-ए-हिज्र-यार कौन करे
हुस्न को शर्मसार कौन करे
महशर लखनवी
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वुफ़ूर-ए-शौक़ में इक इक क़दम मेरा क़यामत था
ख़ुदा मालूम क्यूँ-कर जल्वा-ज़ार-ए-हुस्न तक पहुँचा
महशर लखनवी
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आँसुओं के जहाँ में रहते हैं
हम इसी कहकशाँ में रहते हैं
महताब अालम
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बंद कमरे में ज़ेहन क्या बदले
घर से निकलो तो कुछ फ़ज़ा बदले
महताब अालम
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बने हैं कितने चेहरे चाँद सूरज
ग़ज़ल के इसतिआराती उफ़ुक़ पर
महताब अालम
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