परवाने आ ही जाएँगे खिंच कर ब-जब्र-ए-इश्क़
महफ़िल में सिर्फ़ शम्अ जलाने की देर है
माहिर-उल क़ादरी
सुनाते हो किसे अहवाल 'माहिर'
वहाँ तो मुस्कुराया जा रहा है
माहिर-उल क़ादरी
यही है ज़िंदगी अपनी यही है बंदगी अपनी
कि उन का नाम आया और गर्दन झुक गई अपनी
माहिर-उल क़ादरी
ये कह के दिल ने मिरे हौसले बढ़ाए हैं
ग़मों की धूप के आगे ख़ुशी के साए हैं
माहिर-उल क़ादरी
यूँ कर रहा हूँ उन की मोहब्बत के तज़्किरे
जैसे कि उन से मेरी बड़ी रस्म-ओ-राह थी
माहिर-उल क़ादरी
ज़रा दरिया की तह तक तो पहुँच जाने की हिम्मत कर
तो फिर ऐ डूबने वाले किनारा ही किनारा है
माहिर-उल क़ादरी
चाँद ख़ामोश जा रहा था कहीं
हम ने भी उस से कोई बात न की
महमूद अयाज़

