ये सर्द-मेहर उजाला ये जीती-जागती रात
तिरे ख़याल से तस्वीर-ए-माह जलती है
महबूब ख़िज़ां
ज़ख़्म बिगड़े तो बदन काट के फेंक
वर्ना काँटा भी मोहब्बत से निकाल
महबूब ख़िज़ां
बहुत दिनों से हिसार-ए-तिलिस्म-ए-ख़्वाब में था
तिलिस्म टूट गया ख़्वाब से निकल आया
महबूब ज़फ़र
ख़ुदा का शुक्र है गिर्दाब से निकल आया
मैं उस के हल्क़ा-ए-अहबाब से निकल आया
महबूब ज़फ़र
निगाह पड़ने न पाए यतीम बच्चों की
ज़रा छुपा के खिलौने दुकान में रखना
महबूब ज़फ़र
दीवार ओ दर ने रंगों से दामन छुड़ा लिया
यक-रंगी-ए-सुकूत से क्यूँ घर निढ़ाल है
महेंद्र कुमार सानी
हो रहा हूँ तिरे दुख में तहलील
अपने हर दर्द से कटता जाऊँ
महेंद्र कुमार सानी

