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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

ये सर्द-मेहर उजाला ये जीती-जागती रात
तिरे ख़याल से तस्वीर-ए-माह जलती है

महबूब ख़िज़ां




ज़ख़्म बिगड़े तो बदन काट के फेंक
वर्ना काँटा भी मोहब्बत से निकाल

महबूब ख़िज़ां




बहुत दिनों से हिसार-ए-तिलिस्म-ए-ख़्वाब में था
तिलिस्म टूट गया ख़्वाब से निकल आया

महबूब ज़फ़र




ख़ुदा का शुक्र है गिर्दाब से निकल आया
मैं उस के हल्क़ा-ए-अहबाब से निकल आया

महबूब ज़फ़र




निगाह पड़ने न पाए यतीम बच्चों की
ज़रा छुपा के खिलौने दुकान में रखना

महबूब ज़फ़र




दीवार ओ दर ने रंगों से दामन छुड़ा लिया
यक-रंगी-ए-सुकूत से क्यूँ घर निढ़ाल है

महेंद्र कुमार सानी




हो रहा हूँ तिरे दुख में तहलील
अपने हर दर्द से कटता जाऊँ

महेंद्र कुमार सानी