ग़म हुआ मेरी ज़िंदगी का मदार
इस क़दर ग़म का एहतिराम किया
कृष्ण गोपाल मग़मूम
मेरी आँखों में किसी ने नहीं देखे आँसू
फिर भी ये सच है कि गिर्यां हूँ हमेशा की तरह
कृष्ण गोपाल मग़मूम
इस गुलशन-ए-हस्ती का हर रंग निराला है
जब रोने लगी शबनम फूलों को हँसी आई
कृष्ण मुरारी
बहुत कहा था कि तुम अकेले न रह सकोगे
बहुत कहा था कि हम को यूँ दर-ब-दर न करना
कृष्ण कुमार तूर
बंद पड़े हैं शहर के सारे दरवाज़े
ये कैसा आसेब अब घर घर लगता है
कृष्ण कुमार तूर
दोनों बहर-ए-शोला-ए-ज़ात दोनों असीर-ए-अना
दरिया के लब पर पानी दश्त के लब पर प्यास
कृष्ण कुमार तूर
एक दिया दहलीज़ पे रक्खा भूल गया
घर को लौट के आने वाला भूल गया
कृष्ण कुमार तूर

