खुल नहीं सकती हैं अब आँखें मेरी
जी में ये किस का तसव्वुर आ गया
ख़्वाजा मीर 'दर्द'
खुल नहीं सकती हैं अब आँखें मिरी
जी में ये किस का तसव्वुर आ गया
ख़्वाजा मीर 'दर्द'
मैं जाता हूँ दिल को तिरे पास छोड़े
मिरी याद तुझ को दिलाता रहेगा
ख़्वाजा मीर 'दर्द'
मत जा तर-ओ-ताज़गी पे उस की
आलम तो ख़याल का चमन है
ख़्वाजा मीर 'दर्द'
मुझे ये डर है दिल-ए-ज़िंदा तू न मर जाए
कि ज़िंदगानी इबारत है तेरे जीने से
ख़्वाजा मीर 'दर्द'
न रह जावे कहीं तू ज़ाहिदा महरूम रहमत से
गुनहगारों में समझा करियो अपनी बे-गुनाही को
ख़्वाजा मीर 'दर्द'
नहीं शिकवा मुझे कुछ बेवफ़ाई का तिरी हरगिज़
गिला तब हो अगर तू ने किसी से भी निभाई हो
ख़्वाजा मीर 'दर्द'

