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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

रेज़ा रेज़ा कर दिया जिस ने मिरे एहसास को
किस क़दर हैरान है वो मुझ को यकजा देख कर

ख़ुशबीर सिंह शाद




रूप रंग मिलता है ख़द्द-ओ-ख़ाल मिलते हैं
आदमी नहीं मिलता आदमी के पैकर में

ख़ुशबीर सिंह शाद




'शाद' इतनी बढ़ गई हैं मेरे दिल की वहशतें
अब जुनूँ में दश्त और घर एक जैसे हो गए

ख़ुशबीर सिंह शाद




थे जिस का मरकज़ी किरदार एक उम्र तलक
पता चला कि उसी दास्ताँ के थे ही नहीं

ख़ुशबीर सिंह शाद




यही क़तरे बनाते हैं कभी तो घास पर मोती
कभी शबनम को ये सीमाब में तब्दील करते हैं

ख़ुशबीर सिंह शाद




ये मुमकिन है तुम्हारा अक्स ही बरहम हो चेहरे से
इसे तुम आइने की सरगिरानी क्यूँ समझते हो

ख़ुशबीर सिंह शाद




ये सच है चंद लम्हों के लिए बिस्मिल तड़पता है
फिर इस के बअ'द सारी ज़िंदगी क़ातिल तड़पता है

ख़ुशबीर सिंह शाद