ये तेरा ताज नहीं है हमारी पगड़ी है
ये सर के साथ ही उतरेगी सर का हिस्सा है
ख़ुशबीर सिंह शाद
ज़रा ये धूप ढल जाए तो उन का हाल पूछेंगे
यहाँ कुछ साए अपने आप को पैकर बताते हैं
ख़ुशबीर सिंह शाद
गालियाँ ग़ैर से सुनाते हो
हाँ मियाँ और तुम से क्या होगा
ख़्वाजा अमीनुद्दीन अमीन
मैं दर-गुज़रा साहिब-सलामत से भी
ख़ुदा के लिए इतना बरहम न हो
ख़्वाजा अमीनुद्दीन अमीन
सुब्ह गर सुब्ह-ए-क़यामत हो तो कुछ पर्वा नहीं
हिज्र की जब रात ऐसी बे-क़रारी में कटी
ख़्वाजा अमीनुद्दीन अमीन
हर तमन्ना दिल से रुख़्सत हो गई
अब तो आ जा अब तो ख़ल्वत हो गई
ख़्वाजा अज़ीज़ुल हसन मज्ज़ूब
हम तिरा नज़्अ' तलक जौर सहे जाते हैं
याद आएँगे बहुत इतना कहे जाते हैं
ख़्वाजा मीर अमानी

