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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

ज़िंदगी में जो तुम्हें ख़ुद से ज़ियादा थे अज़ीज़
उन से मिलने क्या कभी जाते हो क़ब्रिस्तान भी

ख़ुर्शीद तलब




अँधेरों में भटकना है परेशानी में रहना है
मैं जुगनू हूँ मुझे इक शब की वीरानी में रहना है

ख़ुशबीर सिंह शाद




अब अंधेरों में जो हम ख़ौफ़-ज़दा बैठे हैं
क्या कहें ख़ुद ही चराग़ों को बुझा बैठे हैं

ख़ुशबीर सिंह शाद




बहुत दिनों से मिरे बाम-ओ-दर का हिस्सा है
मिरी तरह ये उदासी भी घर का हिस्सा है

ख़ुशबीर सिंह शाद




भँवर जब भी किसी मजबूर कश्ती को डुबोता है
तो अपनी बेबसी पर दूर से साहिल तड़पता है

ख़ुशबीर सिंह शाद




चलो अच्छा हुआ आख़िर तुम्हारी नींद भी टूटी
चलो अच्छा हुआ अब तुम भी ख़्वाबों से निकल आए

ख़ुशबीर सिंह शाद




एक हम हैं कि परस्तिश पे अक़ीदा ही नहीं
और कुछ लोग यहाँ बन के ख़ुदा बैठे हैं

ख़ुशबीर सिंह शाद