तू मुझे बनते बिगड़ते हुए अब ग़ौर से देख
वक़्त कल चाक पे रहने दे न रहने दे मुझे
ख़ुर्शीद रिज़वी
या शिकन-आलूद हो जाएगी मंज़र की जबीं
या हमारी आँख के शीशे में बाल आ जाएगा
ख़ुर्शीद रिज़वी
ये दौर वो है कि बैठे रहो चराग़-तले
सभी को बज़्म में देखो मगर दिखाई न दो
ख़ुर्शीद रिज़वी
ऐ इंतिज़ार-ए-सुब्ह-ए-तमन्ना ये क्या हुआ
आता है अब ख़याल भी तेरा थका हुआ
ख़ुर्शीद अहमद जामी
बड़े दिलचस्प वादे थे बड़े रंगीन धोके थे
गुलों की आरज़ू में ज़िंदगी शोले उठा लाई
ख़ुर्शीद अहमद जामी
चमकते ख़्वाब मिलते हैं महकते प्यार मिलते हैं
तुम्हारे शहर में कितने हसीं आज़ार मिलते हैं
ख़ुर्शीद अहमद जामी
जलाओ ग़म के दिए प्यार की निगाहों में
कि तीरगी है बहुत ज़िंदगी की राहों में
ख़ुर्शीद अहमद जामी

