मौत की एक अलामत है अगर देखा जाए
रूह का चार अनासिर पे सवारी करना
ख़ुर्शीद रिज़वी
मिरे इस अव्वलीं अश्क-ए-मोहब्बत पर नज़र कर
ये मोती सीप में फिर उम्र-भर आता नहीं है
ख़ुर्शीद रिज़वी
मुझे भी अपना दिल-ए-रफ़्ता याद आता है
कभी कभी किसी बाज़ार से गुज़रते हुए
ख़ुर्शीद रिज़वी
नुस्ख़ा-ए-मरहम-ए-इक्सीर बताने वाले
तू मिरा ज़ख़्म तो पहले मुझे वापस कर दे
ख़ुर्शीद रिज़वी
पलट कर अश्क सू-ए-चशम-ए-तर आता नहीं है
ये वो भटका मुसाफ़िर है जो घर आता नहीं है
ख़ुर्शीद रिज़वी
तमाम उम्र अकेले में तुझ से बातें कीं
तमाम उम्र तिरे रू-ब-रू ख़मोश रहे
ख़ुर्शीद रिज़वी
तुम्हारी बज़्म से तन्हा नहीं उठा 'ख़ुर्शीद'
हुजूम-ए-दर्द का इक क़ाफ़िला रिकाब में था
ख़ुर्शीद रिज़वी

