ज़ीस्त का इक गुनाह कर सके न हम
साँस के वास्ते भी मर सके न हम
ख़ुमार कुरैशी
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तुम मेरी मसाफ़त के लिए आख़िरी हद हो
अब तुम से परे राहगुज़र कोई नहीं है
ख़ुर्रम ख़लीक़
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आमद का तिरी जब कोई इम्कान नहीं है
कब तक दिल-ए-बे-ताब यूँही थाम रखें हम
ख़ुर्रम ख़िराम सिद्दीक़ी
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आते आते आएगी दुनिया-दारी
जाते जाते फ़ाक़ा-मस्ती जाएगी
खुर्शीद अकबर
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ऐ शहर-ए-सितम-ज़ाद तिरी उम्र बड़ी हो
कुछ और बता नक़्ल-ए-मकानी के अलावा
खुर्शीद अकबर
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बड़ी भोली है ख़र्चीली ज़रूरत
शहंशाही कमाई माँगती है
खुर्शीद अकबर
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बदन में साँस लेता है समुंदर
मिरी कश्ती हवा पर चल रही है
खुर्शीद अकबर
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