हाथ उठता नहीं है दिल से 'ख़ुमार'
हम उन्हें किस तरह सलाम करें
ख़ुमार बाराबंकवी
हम पे गुज़रा है वो भी वक़्त 'ख़ुमार'
जब शनासा भी अजनबी से मिले
ख़ुमार बाराबंकवी
हटाए थे जो राह से दोस्तों की
वो पत्थर मिरे घर में आने लगे हैं
ख़ुमार बाराबंकवी
इलाही मिरे दोस्त हों ख़ैरियत से
ये क्यूँ घर में पत्थर नहीं आ रहे हैं
ख़ुमार बाराबंकवी
जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ
सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए
ख़ुमार बाराबंकवी
झुँझलाए हैं लजाए हैं फिर मुस्कुराए हैं
किस एहतिमाम से उन्हें हम याद आए हैं
ख़ुमार बाराबंकवी
कहीं शेर ओ नग़्मा बन के कहीं आँसुओं में ढल के
वो मुझे मिले तो लेकिन कई सूरतें बदल के
ख़ुमार बाराबंकवी

