चेहरे हैं कि सौ रंग में होते हैं नुमायाँ
आईने मगर कोई सियासत नहीं करते
खुर्शीद अकबर
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दलीलें छीन कर मेरे लबों से
वो मुझ को मुझ से बेहतर काटता है
खुर्शीद अकबर
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दर्द का ज़ाइक़ा बताऊँ क्या
ये इलाक़ा ज़बाँ से बाहर है
खुर्शीद अकबर
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दिल है कि तिरे पाँव से पाज़ेब गिरी है
सुनता हूँ बहुत देर से झंकार कहीं की
खुर्शीद अकबर
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दुनिया को रौंदने का हुनर जानता हूँ मैं
लेकिन ये सोचता हूँ कि दुनिया के बा'द क्या
खुर्शीद अकबर
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ग़ैब का ऐसा परिंदा है ज़मीं पर इंसाँ
आसमानों को जो शह-पर पे उठाए हुए है
खुर्शीद अकबर
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ग़रीबी काटना आसाँ नहीं है
वो सारी उम्र पत्थर काटता है
खुर्शीद अकबर
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